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Kaviyon Ki Yaad Mein ( Sansmaran ) [Paperback] Kantikumar Jain [Paperback] Kantikumar Jain

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Author: Kantikumar Jain

Brand: Anuugya Books

Edition: 1

Features:

  • Satire, Books by Kanti Kumar Jain

Binding: paperback

Number Of Pages: 188

Release Date: 01-12-2018

Part Number: B07DCQ9YJZ

Details: मनोविज्ञान के मेरे एक विद्वान् मित्र ने मुझे बताया कि गेस्टाल्ट मनोविज्ञान में यह माना जाता है कि ''होल इज मोर दैन सम आफ इट्स पाटर््सÓÓ। इसका मर्म भी इन्होंने मुझे समझाया कि एक समुच्चय के अवयवों को अलग-अलग जानना एक बात है पर सभी अवयवों के समुच्चय को जानना दूसरी बात। इसी दूसरी बात को जानने के लिए मैंने कवियों पर लिखे अपने संस्मरणों में से नौ का चयन किया। इन्हीं नौ कवियों का चयन क्यों किया गया यह प्रश्न पूछना असंगत नहीं है पर इस पर मेरा उत्तर होगा कि मैं किन्हीं भी नौ कवियों को चुनता तो कोई-न-कोई ऐसा प्रश्न पूछ ही सकता था। इन नौ कवियों में सभी की अपनी विशिष्टता है। इनमें यदि सियाराम शरण गुप्त जैसे गाँधीवादी हैं तो त्रिलोचन जैसे माक्र्सवादी, बच्चन जैसे मंचप्रिय हैं तो रामविलास शर्मा (डॉक्टर नहीं) जैसे नितान्त गोष्ठीवादी, सद्गुणी मुकुटधर पांडेय हैं तो काम को एकमात्र पुरुषार्थ मानने वाले 'अंचलÓ भी। शिवमंगल सिंह 'सुमनÓ जैसे अवसर आखेटक हैं तो जीवन लाल वर्मा 'विद्रोहीÓ जैसे 'फिकरनाटÓ कवि भी। दुष्यन्त कुमार त्यागी को जानने वाले उसे एक खिलन्दड़े व्यक्ति के रूप में जानते थे। किन्तु उसने अपनी $गज़लों से आपातकाल के सच को वायरल कर इतिहास में अपना स्थान सुनिश्चित कर लिया। इन कवियों पर संस्मरण लिखते समय मैं यह नहीं जान पाया था कि अच्छे कवि की या कवि मात्र की 'रेसिपीÓ क्या है? मेरे इस निष्कर्ष की पुष्टि की अंग्रेजी के अनुभवी प्राध्यापक और समीक्षक श्री सुरेश द्विवेदी ने जो अकम्प भाव से यह मानते हैं कि संस्मरणों के मेरे तूणीर में व्यंग्य और कटूक्तियों के जो तीर हैं वे आविल व्यक्तियों पर ज्यादा कारगर होते हैं, अनाविल व्यक्तियों की तुलना में।

Package Dimensions: 9.0 x 6.0 x 0.5 inches

Languages: Hindi