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Jo Kuchh Rah Gaya Ankaha

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Author: Kedarnath Pandey

Brand: Rajkamal Prakashan

Binding: paperback

Number Of Pages: 224

Release Date: 01-07-2019

Part Number: 9388933303

Details: ‘जो कुछ रह गया अनकहा’ लेखक के जीवनदृसंघर्षों की औपन्यासिक गाथा है। इसे पढ़ते हुए लेखक के जीवन से ही नहीं, युग-युग के उस सच से भी अवगत हो सकते हैं जो अपनी प्रक्रिया में एक दिन एक मिसाल बनता है। उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर का गाँव वीरपुर, जहाँ लेखक का जन्म हुआ, यह खाँटी बाँगर मिट्टी का क्षेत्र है। यहाँ सिंचाई के अभाव में तब मुश्किल से ज्वार, बाजरा की फसल उपजती। लेखक ने खेती करते हुए पढ़ाई की तो आजीविका के लिए भटकाव की स्थिति से गुजरना पड़ा। सबसे पहले कानपुर में 60 रुपये क वेतन की नौकरी की, यह नौकरी रास नहीं आई तो नौ माह पश्चात् ही घर आ गए और गाँव के निजी संस्कृत विद्यालय में अध्यापन का कार्य सँभाला। पढ़ने की ललक निरन्तर बनी रही तो धीरे-धीरे एम-ए-, एम-एड- तक की शिक्षा प्राप्त कर ली। फिर बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के जिला सचिव का पद मिला। 1977 में सीवान में अखिल भारतीय भोजपुरी सम्मेलन हुआ तो सीवान जिला इकाई का सचिव-पद मिला। फिर 1992 में मुजफ्रफरपुर राज्य संघ में महासचिव हुए। 2008 में अखिल भारतीय शान्ति एकजुटता संगठन के सौजन्य से वियतनाम में आयोजित द्वितीय भारत वियतनाम मैत्री महोत्सव में शिष्टमंडल के सदस्य रहे। समय तेजी से परिवर्तित होता गया, लेखक को वह दौर भी देखने को मिला जब दुनिया-भर में शिक्षा और शिक्षकों के समक्ष एक ही प्रकार की चुनौतियाँ आईं। शिक्षा पर निजीकरण और व्यावसायीकरण का खतरा मँडराया, जब शिक्षकों के संवर्ग को समाप्त कर अल्पवेतन, अल्प योग्यताधारी शिक्षकों की नियुक्ति कर शिक्षा को पूर्णतः बाजार के हवाले कर देने की योजना को बढ़ावा मिला। लेखक इससे विचलित तो नहीं हुआ परन्तु शारीरिक तौर पर अस्वस्थता ने जीवन-नौका को डुबाने की कगार पर ला दिया। अन्ततः एन्जियोप्लास्टी के कष्ट को भी झेलना पड़ा। एक बार फिर जीवन संघर्षों से जूझने को बाध्य हो गया। तब लगा जीवन-संघर्षों से ही निखरता है जैसे सोना अग्नि में तपकर चमकता है। हम कह सकते हैं कि यह पुस्तक अपने आख्यान में जीवन्त तो है ही, अपने पाठ में जीने और जीतने की कला भी सिखाती है.

EAN: 9789388933308

Package Dimensions: 8.4 x 5.6 x 0.7 inches

Languages: Hindi