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Author: Anuj Lugun

Brand: Rajkamal Prakashan

Edition: First Edition

Binding: paperback

Number Of Pages: 168

Release Date: 20-09-2023

Details: सभ्यता के तथाकथित केन्द्रों से अपसरित आक्रामक विकास के विरुद्ध संघर्षरत नागरिकता के आत्मनिर्भर हाशियों के पक्ष में हिन्दी कविता को एक निर्णायक भंगिमा देने में अनुज लुगुन की कविता की अहम भूमिका रही है। आदिवासियत को जीवन-पद्धति के साथ-साथ एक वैचारिक अवधारणा के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए उन्होंने प्रतिरोध की काव्य-चेतना को एक सशक्त मोर्चा देने का प्रयास निरंतर अपनी कविता में किया है। वे उस जीवन के बीचोबीच रहते आए हैं जो मुख्यधारा से दूर अपनी प्राकृतिक जिजीविषा और सम्पूर्णता के साथ पेड़ों, पहाड़ों, नदियों और पशु-पक्षियों से अपने आदिम रिश्ते निभाते हुए अपने अस्तित्व में सार्थक है और जिसे चाहें तो मुख्यधारा के विकल्प के रूप में भी देखा जा सकता है। लेकिन होता इसके विपरीत है। मुख्यधारा उस बहुरंगी जीवन को अपने जैसा कर लेना चाहती है, सो भी बिना उनकी मर्जी के। आदिवासियत का केन्द्रीय सरोकार इसी अनचाहे आप्लावन से बचे रहना है। यही उसका संघर्ष है और अनुज की कविताएँ लगातार इस संघर्ष के साथ चलती हैं। अघोषित उलगुलान में इस सफर की हर छवि अपने मूल मानवीय तर्क के साथ उपस्थित है। ये कविताएं आदिवासी जीवन के खूबसूरत बिम्ब हम तक पहुँचाती हैं तो आक्रान्ताओं के विरुद्ध तनी मुट्ठियों को भी स्वर देती हैं। देशों, भाषाओं और संस्कृतियों के पार जाते हुए वे हर उस असहाय के साथ खड़ी होती हैं जो परभक्षी सभ्यता के निशाने पर है, जिसे सत्ता और शक्ति की विभिन्न संरचनाओं ने गैरजरूरी के खाते में डाल दिया है। नींद के बारे में सबसे मीठे गीत गाने वाले तोतों और सहजीवी भाव से अपनी दैनंदिन मुश्किलों को आसान करते ग्रामीण जनों से लेकर क्यूबा और फिलिस्तीन तक फैले यातना और प्रतिरोध के चित्रों को वे सहज ही हमारे स्थानीय बोध का हिस्सा बना देते हैं—“टूटे पुल के उस पार/फेंकता हूँ एक डोरी/आदमीयत की टोली में/आदमीयत के लिए संघर्ष कर रहे टोलों की ओर से”—आह्वान है पृथ्वी के किसी भी कोने में संघर्षरत आदमीयत को एक साथ होकर लड़ने का जिसे अनुज की कविता अनुभूति की प्रामाणिक छवियों के साथ हम तक पहुँचाती है।

EAN: 9789392757778

Package Dimensions: 8.4 x 5.5 x 0.6 inches

Languages: Hindi