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लेखक: मधुकर उपाध्याय
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
भाषा: हिंदी
ISBN: 9788181436369
कवर: हार्ड कवर

पुस्तक के बारे में:
1857 का विद्रोह उतना सीमित और संकुचित नहीं था, जैसा उसे अंग्रेजों द्वारा पेश किया गया। वह मात्र सिपाही विद्रोह नहीं था, बल्कि उसमें जनभागीदारी थी। अगर यह सिपाही विद्रोह होता तो 'रोटी-संदेश' कैसे फैलता? विद्रोहियों का कूट वाक्य 'सितारा गिर पड़ेगा' एक से दूसरी जगह कैसे पहुँचता? यह संदेश कि सब लोग अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हो जाएं, रास्ते के सभी गांवों में वांछित असर डालता था। जिस गांव में रोटी पहुँचती, वहां से पांच रोटियां बनाकर अगले गांवों के लिए रवाना कर दी जातीं। एक तथ्य यह भी है कि रोटी एक रात में सवा तीन सौ किलोमीटर दूर के गांव तक पहुँच जाती थी। सभी लोग अंग्रेजों से त्रस्त थे और विद्रोह ने उन्हें एकजुट होने का अवसर दिया। अंग्रेजों से आजादी की उम्मीद जागृत की।

विद्रोह में शामिल विभिन्न समुदायों के कारण अलग-अलग मुद्दे हो सकते थे, लेकिन लक्ष्य एक था। इसमें धर्म, अर्थव्यवस्था, खेती, समाज और रियासतदारी सब शामिल थे। इसमें कोई अलगाव नहीं था बल्कि साझा सपना था। लोग जुड़ते चले गए।

1857 को सबसे पहले 'राष्ट्रीय विद्रोह' के रूप में कार्ल मार्क्स ने पहचाना। उन्होंने कहा, "यह सैनिक बगावत नहीं, राष्ट्रीय विद्रोह है।" यह टिप्पणी 28 जुलाई, 1857 को न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून में प्रकाशित हुई थी, और उसी साल उनके दो और लेख 1857 पर प्रकाशित हुए थे। इसके बावजूद भारत में तत्कालीन टिप्पणीकार इस पर चुप रहे। शायद सावरकर ने अंग्रेजी दमन के भय से चुप्पी साधी। भारत में इसे अपनी पुस्तक सत्तावन का स्वातंत्र्य समर में 'प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' कहा और पचास साल बाद 1907 में 1857 की स्वर्णजयंती पर इसे प्रकाशित किया।

विष्णुभट्ट उस विद्रोह को आम जनता की नजर से देखते हैं। वह घटनाओं को रोज़नामचे की तरह प्रस्तुत करते हैं, जिसमें कई बार अफवाहें और सुनी-सुनाई खबरें दाखिल हो जाती हैं, लेकिन इससे पुस्तक की गंभीरता और महत्व कम नहीं होता। पूरी किताब से यह आभास होता है कि आम लोग 1857 के विद्रोह में किसी मजबूरी के कारण शामिल नहीं हुए। बार-बार यह लगता है कि जनता अंग्रेजों से डरती थी और उनसे नफरत करती थी, और चाहती थी कि अंग्रेज भारत से चले जाएं।