Tulsidas Chandan Ghisain
Tulsidas Chandan Ghisain is backordered and will ship as soon as it is back in stock.
Couldn't load pickup availability
Genuine Products Guarantee
Genuine Products Guarantee
We guarantee 100% genuine products, and if proven otherwise, we will compensate you with 10 times the product's cost.
Delivery and Shipping
Delivery and Shipping
Products are generally ready for dispatch within 1 day and typically reach you in 3 to 5 days.
Sign up to be the first to know when it's here
Author: Harishankar Parsai
Brand: Rajkamal Prakashan
Edition: Ninth
Binding: paperback
Number Of Pages: 175
Release Date: 01-01-2015
Part Number: Refer to Sapnet.
Details: हरिशंकर परसाई के लिए व्यंग्य साध्य नहीं, साधन था ! यही बात उनको साधारण व्यंग्यकारों से अलग करती है ! पाठक को हँसाना, उसका मनोरंजन करना उनका मकसद नहीं था ! उनका मकसद उसे बदलना था ! और यह काम समाज-सत्य पर प्रमाणिक पकड़, सच्ची सहानुभूति और स्पष्ट विश्व-दृष्टि के बिना संभव नहीं हो सकता ! खास तौर पर अगर आपका माध्यम व्यंग्य जैसी विधा हो ! हरिशंकर परसाई के यहाँ ये सब खूबियाँ मिलती हैं ! उनकी दृष्टि की तीक्ष्णता और वैचारिक स्पष्टता उनको व्यंग्य-साहित्य का नहीं विचार-साहित्य का पुरोधा बनाती है ! तुलसीदास चन्दन घिसैं के आलेखों का केंद्रीय स्वर मुख्यतः सत्ता और संस्कृति के सम्बन्ध हैं ! इसमें हिंदी साहित्य का समाज और सत्ता प्रतिष्ठानों से उसके संबंधों के समीकरण बार-बार सामने आते हैं ! पाक्षिक 'सारिका' में 84-85 के दौरान लिखे गए इन निबंधों में परसाई जी ने उस दुर्लभ लेखकीय साहस का परिचय दिया है, जो न अपने समकालीनों को नाराज करने से हिचकता है और न अपने पूर्वजों से ठिठोली करने से जिसे कोई चीमड़ नैतिकता रोकती है ! गौरतलब यह कि इन आलेखों को पढ़ते हुए हमें बिलकुल यह नहीं लगता कि इन्हें आज से कोई तीन दशक पहले लिखा गया था ! हम आज भी वैसे ही हैं और आज भी हमें एक परसाई की जरूरत है जो चुटकियों से ही सही पर हमारी खाल को मोटा होने से रोकता रहे !
EAN: 9788171789061
Package Dimensions: 7.2 x 5.0 x 0.6 inches
Languages: Hindi

