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Author: Kashinath Singh

Brand: Rajkamal Prakashan

Edition: First Edition

Binding: hardcover

Number Of Pages: 396

Release Date: 01-01-2019

Part Number: 8126707763

Details: सुप्रसिद्ध कथाकार काशीनाथ सिंह पिछले चालीस वर्षों से हिन्दी कथा में सक्रिय और तरो-ताजा हैं। उन्होंने अपने लेखन के जरिए पाठकों की नई जमात तैयार की है—युवाओं की जमात अपना मोर्चा लिखकर और साहित्य से कोई सरोकार न रखनवाले सामान्य पाठकों के संस्मरण और काशी का अस्सी लिखकर। लेकिन ऊपर से आरोप यह कि उन्होंने साहित्य की कुलीनता की धज्जियाँ उड़ाई हैं। इसके एवज में उन्होंने गालियाँ भी खाई हैं, उपेक्षाएँ भी झेली हैं और खतरे भी उठाए हैं। यह यों ही नहीं है कि कथा-कहानी में आनेवाली हर युवा पीढ़ी काशी को अपना समकालीन और सहयात्री समझती रही है। ऐसा क्यों है—यह देखना हो तो कहनी उपखान पढऩा चाहिए। कहनी उपखान काशी की सारी छोटी-बड़ी कहानियों का संग्रह है—अब तक की कुल जमा-पूँजी। मात्र चालीस कहानियाँ। देखा जाना चाहिए कि वह कौन-सी खासियत है कि इतनी-सी पूँजी पर काशी लगातार कथा-चर्चा में बने रहे हैं और आलोचकों के लिए भी ‘अपरिहार्य’ रहे हैं। काल और काल से छेड़छाड़ और मुठभेड़—पहचान है काशी की कहानियों की। काल के केन्द्र में है सामाजिक और आर्थिक विसंगतियों से घिरा आदमी—कभी अकेले, कभी परिवार में, कभी समाज में। इस आदमी से मिलना यानी कहानियों को पढऩा हरी-भरी जिन्दगी के बीच चहलकदमी करने जैसा है। न कहीं बोरियत, न एकरसता, न मनहूसियत, न दुहराव। उठने-गिरने, चलने-फिरने, लडऩे-हारने में भी हँसी-ठट्ठा और व्यंग्य-विनोद। जिन्दादिली कहीं भी पाठक का साथ नहीं छोड़ती। जियो तो हँसते हुए, मरो तो हँसते हुए—यही जैसे जीने का नुस्खा हो पात्रों के जीवन का। जैसे-जैसे जिन्दगी बदली है, वैसे-वैसे काशी की कहानी भी बदली है—अगर नहीं बदला है तो कहानी कहने का अन्दाज। जातक, पंचतंत्र और लोकप्रचलित कथाशैलियाँ जैसे उनके कहानीकार के खून में हैं। कई कहानियाँ तो चौपाल या अलाव के गिर्द बैठकर सुनने का सुख देती हैं। आइए, वह सुख आप भी लीजिए कहनी उपखान पढक़र। कहनी (कहानी) और उपखान (उपाख्यान) कहकर तो काशी ने लिया है, आप भी लीजिए पढक़र, क्योंकि काशी को पढऩा ही सुनना है।.

EAN: 9788126707768

Package Dimensions: 8.5 x 5.5 x 1.3 inches

Languages: Hindi