{"product_id":"trika-bhava-and-the-moon-1","title":"त्रिक भाव और चन्द्रमा: Trika Bhava and The Moon","description":"\u003cp\u003eGot it! Here's the revised version without the \"Details\" line:\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eBook Detail:\u003c\/strong\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cul\u003e\n\u003cli\u003e\n\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eAuthor\u003c\/strong\u003e: गिरिश चन्द्रजोशी: Girish Chandra Joshi\u003c\/p\u003e\n\u003c\/li\u003e\n\u003cli\u003e\n\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eBrand\u003c\/strong\u003e: Alpha Publications\u003c\/p\u003e\n\u003c\/li\u003e\n\u003cli\u003e\n\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eBinding\u003c\/strong\u003e: Paperback\u003c\/p\u003e\n\u003c\/li\u003e\n\u003cli\u003e\n\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eNumber of Pages\u003c\/strong\u003e: 179\u003c\/p\u003e\n\u003c\/li\u003e\n\u003cli\u003e\n\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eRelease Date\u003c\/strong\u003e: 2013\u003c\/p\u003e\n\u003c\/li\u003e\n\u003cli\u003e\n\u003cp\u003e\u003cstrong\u003ePackage Dimensions\u003c\/strong\u003e: 21.5 cm x 14 cm; 220 gm\u003c\/p\u003e\n\u003c\/li\u003e\n\u003cli\u003e\n\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eLanguages\u003c\/strong\u003e: Hindi\u003c\/p\u003e\n\u003cdiv class=\"title is-size-3-desktop is-size-5-touch has-text-centered underlined-decorated-title\"\u003eBook Description\u003c\/div\u003e\n\u003cdiv class=\"product-details-description\"\u003e\n\u003cdiv class=\"WordSection1\"\u003e\n\u003cp align=\"center\" class=\"MsoNormal\"\u003e\u003cb\u003e\u003cspan lang=\"HI\"\u003e।। पुस्तक के बारे में ।।\u003c\/span\u003e\u003c\/b\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp class=\"MsoNormal\"\u003e\u003cspan lang=\"HI\"\u003eप्रस्तुत पुस्तक चन्द्रमा की षष्ठ\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eअष्टम व द्वादश भावों में स्थिति को ध्यान में रखकर लिखी गई है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र में लग्न को शरीर सूर्य को आत्मा तथा चन्द्रमा को मन का कारक कहा गया है। इसका वर्णन\u003c\/span\u003e ''\u003cspan lang=\"HI\"\u003eचन्द्रमा मनसो जातस्चक्षो सूर्यो अजायत। श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निजायत।।\u003c\/span\u003e'' \u003cspan lang=\"HI\"\u003eपुरुष सूक्त के इस श्लोक की पंक्ति में भी मिलता है। चन्द्रमा मन क्टई तरह ही एक अति संवेदनशील ग्रह ही जिस तरह से मन किसी भी आघात से पीड़ित हो जाता है\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eउसी तरह मन रूपी चन्द्रमा पर पाप ग्रहों का कुप्रभाव उसे पीड़ित कर देता है। जिस प्रकार से मन की कल्पनाएँ भौतिकरूपी आकाश में उड़ान भरती हैं तथा दूसरे ही पल जमीन सूँघने को विवश हो जाती हैं उसी प्रकार से चन्द्रमा दिन\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eप्रतिदिन बढ़ते हुए अपने पूरे यौवन पर पहुँच कर दूसरे ही दिन से यौवन को दिन\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eप्रतिदिन क्षीण होते देखता रह जाता है। यहाँ पर \u003c\/span\u003e\u003cb\u003e'\u003cspan lang=\"HI\"\u003eजीवन से मृत्यु की ओर\u003c\/span\u003e'\u003c\/b\u003e \u003cspan lang=\"HI\"\u003eका सिद्धांत स्पष्ट रूप से लागू होते हुए देख सकते हैं। चन्द्रमा की त्रिक भावों में स्थिति का फल निम्न प्रकार से कहा गया है\u003c\/span\u003e:-\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp align=\"center\" class=\"MsoNormal\"\u003e\u003cb\u003e\u003cspan lang=\"HI\"\u003eषष्ठाष्टरिफष्फ गश्चन्द्र\u003c\/span\u003e\u003c\/b\u003e\u003cb\u003e\u003cspan\u003e: \u003cspan lang=\"HI\"\u003eक्रूरै\u003c\/span\u003e: \u003cspan lang=\"HI\"\u003eखैटैश्च वीक्षित\u003c\/span\u003e: \u003cspan lang=\"HI\"\u003e।\u003c\/span\u003e\u003c\/span\u003e\u003c\/b\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp align=\"center\" class=\"MsoNormal\"\u003e\u003cb\u003e\u003cspan lang=\"HI\"\u003eजातस्य मृत्युदद\u003c\/span\u003e\u003c\/b\u003e\u003cb\u003e\u003cspan\u003e: \u003cspan lang=\"HI\"\u003eसद्यस्त्वष्ट वर्षे\u003c\/span\u003e: \u003cspan lang=\"HI\"\u003eशुमेक्षित ।।\u003c\/span\u003e\u003c\/span\u003e\u003c\/b\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp class=\"MsoNormal\"\u003e\u003cspan lang=\"HI\"\u003eवृहद् पराशर होराशास्त्रम् अर्थात् लग्न से षष्ठ अष्टम व द्वादश स्थान स्थित चन्द्रमा यदि पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक का शीघ्र मरण हो जाता है। यदि उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो आठवें वर्ष अरिष्ट होता है। चन्द्रमा की भुक्त प्रतिपदा से अमावस्या तक की स्थिति के उपरोक्त सिद्धांत के आधार पर ही इसे आयु व मृत्यु से सम्बन्धित ग्रह भी माना गया है। उदाहरणस्वरूप\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e- \u003cspan lang=\"HI\"\u003eबालारिष्ट ज्ञान\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eचन्द्र को लग्न मानकर शुभाशुभ विचार\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eदशा गणना का आधार व विचार तथा गोचरादि इन सभी में चन्द्रमा का ही महत्व है। बालारिष्ट चकमा की पीड़ित स्थिति का ही मुख्य कारण है। पक्षबल से हीन चन्द्रमा त्रिक स्थान में अन्य पाप ग्रहों से युत\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eदृष्ट होकर बैठा हो अथवा गण्डान्त\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eमृत्युभाग में स्थित पक्षबलहीन चन्द्रमा त्रिकभाव में बैठा हो तथा उस पर किसी भी प्रकार से शुभ ग्रहों का प्रभाव न हो। यह दोनों ही भयावह स्थितियाँ अरिष्टता क्य स्पष्ट संकेत करती हैं। इक्के विपरीत पक्षबली चन्द्रमा गण्डान्त\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eमृत्युभाग आदि से पीड़ित न हो तथा तुम ग्रहों से दृष्ट\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eयुत होकर त्रिक भावों में भी स्थित हो तो अरिष्ट कारक नहीं होगा अपितु दीर्घायु प्रदाता हो जाएगा। उक्त स्थिति में चन्द्रमा की वर्गों में स्थिति का अवलोकन कर लेना अत्यन्त आवशक होता है क्योंकि जो ग्रह मृत्युभाग आदि में स्थित है अगर वह षद्वर्गों\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eसप्तवर्गों\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eदशवर्गों अथवा षोडशवर्गों में अधिकाधिक जन्मकालीन राशि मित्र राशि\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eस्वराशि\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eअतिमित्र राशि तथा उच्चराशि में स्थित हो तो उस ग्रह की अशुभता में न्यूनता आ जाएगी। वह जन्मांग में शुभ भावों का स्वामी है तो उक्त भावों के शुभफल प्राप्त होने लगेंगे परन्तु अगर मृत्युभागादि में स्थित ग्रह की वर्गों में भी स्थिति दयनीय हुई तो वह ग्रह अत्यधिक अनिष्टकारी प्रभाव दे सकता है। यह भी स्मरणीय है कि यदि ग्रह अंशात्मक जाँच में दोषी नही पाया गया हो परन्तु वह सप्तवर्गों\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eसप्तवर्गों\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eदशवर्गों अथवा षोडशवर्गों में अधिकाधिक शत्रुराशि\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eसमराशि\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eअतिशत्रु राशि तथा नीचराक्षि में स्थित हो तो उस ग्रह से शुभफल की आशा नहीं रखनी चाहिए। ऐसा ग्रह जन्मांग में मारक भावों से सम्बन्धित होकर पाप पीड़ित भी हो तो उसकी अशुभता भयावह होगी। परन्तु यहाँ यह भी विशेष है कि ग्रह अंशात्मक जाँच में दोषी नहीं पाया गया है तथा अगर वह षद्वर्गों\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eसप्तवर्गों\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eदशवर्गों अथवा षोडशवर्गों में अधिकाधिक शुभ स्थिति में हो तो ऐसा ग्रह अत्यधिक शुभ होकर जातक को दीर्घायु व अन्य प्रकार से सदैव ही प्रसन्न रखता है। इसके अतिरिक्त लग्न व ग्रहों की शुभाशुभ स्थिति को भी ध्यान में रखना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है कि लग्नादि की जाँच कभी भी एकपक्षीय नहीं होनी चाहिए अर्थात् अंशात्मक जाँच आदि से अशुभता प्राप्त ग्रह की वर्गादि में शुभाशुभ स्थिति भी देख लेनी चाहिए। यहाँ पर अन्य क्षीण\u003c\/span\u003e\/\u003cspan lang=\"HI\"\u003eदीर्ध योगों को भी कुण्डली में लगाकर देख लेना चाहिए।\u003c\/span\u003e\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp align=\"center\" class=\"MsoNormal\"\u003e\u003cb\u003e\u003cspan\u003e''\u003cspan lang=\"HI\"\u003eजाते कुमारे सति पूर्वमार्यैरायुर्विचिन्स्यं हि तत\u003c\/span\u003e: \u003cspan lang=\"HI\"\u003eफलानि।\u003c\/span\u003e\u003c\/span\u003e\u003c\/b\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp align=\"center\" class=\"MsoNormal\"\u003e\u003cb\u003e\u003cspan lang=\"HI\"\u003eविचारणीया गुणिनि स्थितेतद् गुणा\u003c\/span\u003e\u003c\/b\u003e\u003cb\u003e\u003cspan\u003e: \u003cspan lang=\"HI\"\u003eसमस्ता\u003c\/span\u003e: \u003cspan lang=\"HI\"\u003eखलु लझणाज्ञै\u003c\/span\u003e:\u003cspan lang=\"HI\"\u003e।।\u003c\/span\u003e''\u003c\/span\u003e\u003c\/b\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp class=\"MsoNormal\"\u003e\u003cspan lang=\"HI\"\u003eअर्थात् जब बच्चा पैदा हो तो सर्वप्रथम उसकी आयु का विचार करें । तद्पश्चात ही दैवज्ञ को जन्म कुण्डली में स्थित अन्य शुभ योगों का विचार करने को कहना चाहिए।\u003cspan\u003e \u003c\/span\u003e\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e'\u003cspan lang=\"HI\"\u003eषष्ठ\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eअष्टम व द्वादश चन्द्र\u003c\/span\u003e' \u003cspan lang=\"HI\"\u003eनामक इस पुस्तक का प्रारम्भ अंतालक जाँच नामक अध्याय से होता है। अंशात्मक जाँच से तात्पर्य लग्न व ग्रहों के राशि\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eअंशादि की मृत्युभाग\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eविषघटी आदि के सदर्भ में जाँच करके यह देखना है कि लग्न व ग्रह कहीं मृतुभाग आदि में तो नहीं हैं। अंशात्मक जाँच में मृत्युभाग पुष्करांश पुष्कर नवांश\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eविषघटी\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eअमृतघटी\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eग्रहों के उच्च\u003c\/span\u003e\/\u003cspan lang=\"HI\"\u003eनीचादि\u003c\/span\u003e 64 \u003cspan lang=\"HI\"\u003eवाँ नवांश\u003c\/span\u003e 22 \u003cspan lang=\"HI\"\u003eवाँ द्रेष्काण आदि को विस्तारपूर्वक दिया गया है ताकि जाँच के बाद सत्यता के निकट पहुँचा जा सके। इसी अध्याय में नवग्रहों\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eद्वादश भावों के कारकत्वों भावों के स्थिर कारकों तथा भावों पर विचार करने के मूल सिद्धांतों की विस्तार से चर्चा की गई है। तकि ग्रहों\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eभावों व भाव विवेचना ज्ञान के संदर्भ में अयिक से अथिक जानकारी प्राप्त हो सके। उपरोक्त क्रम को जारी रखते हुए द्वितीय अध्याय में आयु व इष्टारिष्ट पर बहुत ही विस्तार से विचार करने की विधि दी गई है अर्थात् आयु को प्रभावित करने वाले कौन\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eकौन से मुख्य अंग होते हैं\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eउनसे किस प्रकार विचार करना चाहिए\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eउन पर पाप या शुभ प्रभाव हो तो वे कैसा फल करेंगे इत्यादि। आयु विचार हेतु जैमिनि मुनि के प्रसिद्ध सिद्धांत लग्न व चब\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eलग्नेश व अष्टमेश तथा लग्न व मेरा लग्न की चर\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eस्थिरादि राशियों से आयु विचार कर पाराशरी के प्रचलित योगायु के सिद्धांतों के संयुक्त प्रयोजन से आयु पर विचार करने की प्रमाणित विथि दी गई है। इसके अतिरिक्त उन शास्त्रीय योगों का भी विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है जो जातक को अल्प\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eमध्य व दीर्घायु प्रदान करने में सहायक हैं। इसी अध्याय में बालारिष्ट के मुख्य घटकों पर भी विचार किया गया है तथा बालारिष्ट भंग योगों का उल्लेख किया गया है। बालारिष्ट के इस भाग में पताकीरिष्ट व त्रिपताकी चक्र से शुभाशुभ फल को भी कहा गया है। इसी अध्याय के मारक दशा गोचर नामक भाग में मारक दशा तथा मारक गोचर के प्रामाणिक सिद्धांतों की भी विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है। श्री बी\u003c\/span\u003e. \u003cspan lang=\"HI\"\u003eदी\u003c\/span\u003e. \u003cspan lang=\"HI\"\u003eरमण कृत जातक निर्णय के अनुसार विभिन्न लग्नों के लिए मारक ग्रहों को भी दिया गया है। इसी अध्याय के उपग्रह स्पष्ट नामक भाग में काल परिधि\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eधूम\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eअर्द्धयाम\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eयमघंट\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eकोदण्ड\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eगुलिक\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eचाप\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eउपकेतु व व्यतिपात स्पष्ट की गणना दी गई है। तालिका के माध्यम से सांकेतिक भाषा में उपग्रहों के फल भी कह दिए गए हैं। विस्तार से जानने के लिए फलदीपिका के पृष्ठ संख्या\u003c\/span\u003e 606 \u003cspan lang=\"HI\"\u003eमें जाकर सम्बन्धित अध्याय से उपग्रहों के फलाफलज्ञात किये जा सकते हैं। द्वितीय अध्याय के अन्य भागों\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eअरिष्ट योग व अरिष्टभंग तथा अल्प\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eमध्य\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eदीर्घ योगों को भी दिया गया है। पुस्तक के तृतीय अध्याय को मात्र तीन महत्वपूर्ण भागों में बाँटा गया है। प्रथम भाग षष्ठ भाव व विभिन्न स्थितियों के नाम से है\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eजिसमें षष्ठ भाव के कारकत्वों के साथ ही चन्द्रमा की षष्ठ भाव में स्थितियों से विस्तारपूर्वक दिया गया है। इसके अतिरिक्त इस भाग में षष्ठ भाव में विभिन्न राशियों में चन्द्रमा की स्थिति व क्त। षष्ठ भाव में विभिन्न राशियों का फल\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eषष्ठ भाव में विभिन्न भावेशों का क्त तथा षष्ठ भाव के अन्य शुभाशुभ योगों को भी दिया गया है। इसी अध्याय का द्वितीय भाग अष्टम भाव व विभिन्न स्थितियों के नाम से है\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eजिसमें अष्टम भाव के कारकत्वों के साथ ही चन्द्रमा की अष्टम भाव में स्थितियों से विस्तारपूर्वक दिया गया है। इसके अतिरिक्त इस भाग में अष्टम भाव में विभिन्न राशियों में चन्द्रमा की स्थिति का फल\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eअष्टम भाव में विभिन्न राशियों का फल\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eअष्टम भाव में विभिन्न भावेशों का क्त तथा अष्टम भाव के अन्य शुभाशुभ योगों को भी दिया गया है। तृतीय भाग द्वादश भाव व विभिन्न स्थितियों के नाम से है\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eजिसमें द्वादश भाव के कारकर्त्वों के साथ ही चन्द्रमा की द्वादश भाव में स्थितियों को विस्तारपूर्वक दिया गया है। इसके अतिरिक्त इस भाग में द्वादश भाव में विभिन्न राशियों में चन्द्रमा की स्थिति का फल\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eद्वादश भाव में विभिन्न राशियों का फल\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eद्वादश भाव में विभिन्न भावेशों का फल तथा द्वादश भाव के अन्य शुभाशुभ योगों को भी दिया गया है। पुस्तक के चतुर्थ अध्याय के प्रथम भाग में प्रामाणिक प्रत्यों की त्रिक भावों पर की गई चिंताओं का उल्लेख किया गया है। द्वितीय भाग में चन्द्रमा के कारकत्वों व उसके बलाबल का विचार किया गया है। इसी अध्याय के तृतीय भाग में षष्ठ\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eअष्टम व द्वादश चन्द्रकृत अरिष्टभंग योगों का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त अन्य भावों में चन्द्रकृत अरिष्टभंग योगों का भी उल्लेख इस भाग में कर दिया क्या है। अंत\u003c\/span\u003e: \u003cspan lang=\"HI\"\u003eमें अर्थात् चतुर्थ अध्याय के पंचम भाग में त्रिक भावस्थ चन्द्र की शुभाशुभ स्थितियों की उदाहरण कुण्डलियों के माध्यम से व्याख्या की गई है। आशा ही नहीं\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eअपितु पूर्ण विश्वास है कि पाठकगण त्रिक भावों में चन्द्रमा की स्थिति पढ़कर लाभान्वित होंगे। इसी आशा के साथ यह पुस्तक ब्रह्मलीन योगी भास्करानन्द जी को समर्पित है।\u003c\/span\u003e\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp align=\"center\" class=\"MsoNormal\"\u003e\u003cb\u003e\u003cspan lang=\"HI\"\u003eलेखक के बारे में\u003c\/span\u003e\u003c\/b\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp class=\"MsoNormal\"\u003e\u003cspan lang=\"HI\"\u003eसोलह वर्ष की किशोरावस्था से ही ज्योतिष के प्रति रुझान के परिणामस्वरूप स्वाध्याय से ज्योतिष सीखने की ललक व गुरु की तलाश में कुमाऊँ क्षेत्र के तत्कालीन प्रकाण्ड ज्योतिर्विदों के उलाहने सहने के बाद भी स्वाध्याय से अपनी यात्रा जारी रखते हुए वर्ष\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e 1985 \u003cspan lang=\"HI\"\u003eमें वह अविस्मरणीय दिन आया जब वर्षों की प्यास बुझाने हेतु परमगुरु की प्राप्ति योगी भाष्करानन्दजी के रूप में सुई। पूज्य गुरुजी ने न केवल मंत्र दीक्षा देकर मेरा जीवन धन्य किया अपितु अपनी ज्योतिष रूपी ज्ञान की अमृतधारा से सिंचित किया। शेष इस ज्योतिष रूपी महासागर से कुछ बूँदें पूज्य गुरुदेव श्री के० एन० राव जी के श्रीचरणों से प्राप्त हुई। जैसा कि वर्ष\u003c\/span\u003e 1986 \u003cspan lang=\"HI\"\u003eकी गुरुपूर्णिमा की रात्रि को योगी जी के श्रीमुख से यह पूर्व कथन प्रकट हुए\u003c\/span\u003e \"\u003cspan lang=\"HI\"\u003eकि मेरे देह त्याग के बाद सर्वप्रथम मेरी जीवनी तुम लिखोंगे। मैं वैकुण्ठ धाम में नारायण मन्दिर इस जीवन में नहीं बना पाऊँगा। मुझे पुन आना होगा\u003c\/span\u003e''\u003cspan lang=\"HI\"\u003e। कालान्तर में योगीजी का कथन सत्य साबित हआ। वर्ष\u003c\/span\u003e 1997 \u003cspan lang=\"HI\"\u003eसे प्रथम लेखन\u003c\/span\u003e-1 \u003cspan lang=\"HI\"\u003eयोगी भाष्कर वैकुण्ठ धाम में योगी जी के जीवन पर लघु पुस्तिका का प्रकाशन हुआ। तत्पश्चात्\u003c\/span\u003e 2. \u003cspan lang=\"HI\"\u003eहिन्दू ज्योतिष का सरल अध्ययन मापा टीका\u003c\/span\u003e 3. \u003cspan lang=\"HI\"\u003eव्यावसायिक जीवन में उतार\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eचढ़ाव भाण टीका\u003c\/span\u003e 4. \u003cspan lang=\"HI\"\u003eआयु अरिष्ट अष्टम चन्द्र\u003c\/span\u003e 5. \u003cspan lang=\"HI\"\u003eआयु निर्णय\u003c\/span\u003e 6. \u003cspan lang=\"HI\"\u003eपरमायु दशा तथा प्रतिष्ठित पत्रों\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eदैनिक जागरण तथा अमर उजाला में प्रकाशित सौ से अधिक सत्य भविष्यवाणियों के उपरान्त दो वर्षों की अथक खोज के उपरान्त कालचक्र दशा से फलित और अव\u003c\/span\u003e '\u003cspan lang=\"HI\"\u003eत्रिक भाव और चन्द्रमा\u003c\/span\u003e' \u003cspan lang=\"HI\"\u003eआपके हाथों में है।\u003c\/span\u003e\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp align=\"center\" class=\"MsoNormal\"\u003e\u003cb\u003e\u003cspan lang=\"HI\"\u003eप्रस्तावना\u003c\/span\u003e\u003c\/b\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp class=\"MsoNormal\"\u003e\u003cspan lang=\"HI\"\u003eपूर्व प्रकाशित\u003cspan\u003e \u003c\/span\u003e\u003c\/span\u003e\u003cb\u003e\u003cspan\u003e'\u003cspan lang=\"HI\"\u003eआयु अरिष्ट\u003c\/span\u003e'\u003c\/span\u003e\u003c\/b\u003e\u003cspan\u003e \u003cspan lang=\"HI\"\u003eऔर \u003c\/span\u003e\u003cb\u003e'\u003cspan lang=\"HI\"\u003eअष्टम चन्द्र\u003c\/span\u003e'\u003c\/b\u003e \u003cspan lang=\"HI\"\u003eसम्भवतया पाठकों को उपयोगी लगी हो परन्तु बार\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eबार मन में यह अहसास हो\u003c\/span\u003e. \u003cspan lang=\"HI\"\u003eरहा था कि त्रिकस्थ चन्द्र का कार्य शायद पूरा नहीं हो पाया है। चूकि सर्वाधिक गुद\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eगुह्य तथा असमंजस रख भय के चक्रव्यूह में घेरने वाले अष्टमस्थ चन्द्र पर तो पूर्व पुस्तक के माध्यम से ज्योतिष जिज्ञासुओं के लिए कुछ मार्गदर्शन हो पाया हो परन्तु अन्य दो त्रिक\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eषष्ठस्थ व द्धादशस्थ चन्द्र पर तो अभी रहस्य बना हुआ है। अष्टम के समान न सही\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eइससे कुछ कमतर षष्ठस्थ एवं द्वादशस्थ चन्द्र को देखते ही ज्योतिर्विद के माथे पर बल पड़े जाते हैं कि आखिर जातक के अरिष्ट का आकलन कैसे किया जाए। अपने प्रकाशन के माध्यम से ज्योतिष जगह की सेवा में लगे एल्फा पब्लिकेशन के स्वामी श्री ए\u003c\/span\u003e. \u003cspan lang=\"HI\"\u003eएल\u003c\/span\u003e. \u003cspan lang=\"HI\"\u003eजैन जी का भी बार\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eबार आग्रह था कि मैं षष्ठ\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eअष्टम एवं द्वादशस्थ चन्द्र के शुभाशुभ फलों के संदर्भ में एक सारगर्भित आलेख दूँ ताकि ज्योतिष जिज्ञासु अष्टम के याथ\u003c\/span\u003e '\u003cspan lang=\"HI\"\u003eषष्ठस्थ एवं द्वादशस्थ चन्द्र के शुभाशुभ फलों विशेषतया अनिष्टकारिता पर एक सही निष्कर्ष तक पहुँव सके। आपके आग्रह को स्वीकार करते हुए मैंने श्री बिरेन्द्र नौटियाल जी की सहायता से यह कार्य सम्पन्न करने का निश्चय किया । चूंकि पूर्व प्रकाशित \u003c\/span\u003e\u003cb\u003e'\u003cspan lang=\"HI\"\u003eआयु निर्णय\u003c\/span\u003e' \u003c\/b\u003e\u003cspan lang=\"HI\"\u003eतथा \u003c\/span\u003e\u003cb\u003e'\u003cspan lang=\"HI\"\u003eकालचक्र दशा से फलित\u003c\/span\u003e'\u003c\/b\u003e \u003cspan lang=\"HI\"\u003eनामक पुस्तक में श्री विरेन्द्र नौटियाल जी का अतुलनीय योगदान रहा है अत\u003c\/span\u003e: \u003cspan lang=\"HI\"\u003eउनकी सहायता के बिना वे कार्य सम्भवतया पूर्ण नहीं हो सकते थे। इसी कारण मुझे श्री बिरेन्द्र नौटियाल जी ने विद्वत्ता पर लेश\u003c\/span\u003e-\u003cspan lang=\"HI\"\u003eमात्र भी शंका न थी। मेरे आग्रह को स्वीकार करते हुए श्री विरेन्द्र नौटियाल जी ने इस पुस्तक के लेखन में भी अपना अभूतपूर्व सहयोग दिया है। यहाँ भरसक प्रयास किया गया है कि त्रिकस्थ चन्द्र अनिष्टकारिता के रहस्यमय बिंब में झाँका जा सके तथा ज्योतिर्विद फलकथन हेतु सुगमता से सत्यता के निकटतम बिनु तक निर्णय ले सके। आशा है\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eपाठक इस प्रयास से लाभान्वित हो सकेंगे। सम्भवतया त्रिकस्थ चन्द्र पर यह प्रथम शोध आलेख होगा जिसे भावी पीढ़ी के ज्यातिर्विद और अधिक शोधपरक व सुस्पष्ट कर ज्योतिष जगत् को लाभान्वित कर सकेंगे। अंत में\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eमैं अपने आत्मिक आशीर्वाद के साथ श्री बिरेन्द्र नौटियाल जी का आभार व्यक्त करता हूँ तथा मुझे आशा ही नहीं\u003c\/span\u003e, \u003cspan lang=\"HI\"\u003eपूर्ण विश्वास है कि ब्रह्मलीन योगी भास्करानन्द जी की अदृश्य कृपा से वह मेरे इस कार्य को आगे बढ़ाते हुए स्वतंत्र रूप से भविष्य में ज्योतिष जगत् को अपनी लेखनी से अनेक नवीन अनुसंधानात्मक आलेख देकर लाभान्वित करेंगे।\u003c\/span\u003e\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003c\/div\u003e\n\u003c\/div\u003e\n\u003c\/li\u003e\n\u003c\/ul\u003e","brand":"Alpha Publications","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":49702158205232,"sku":"DRG.AlphaPublications_NZA980","price":110.5,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0690\/9968\/4144\/files\/alpha-publications-book-default-title-trika-bhava-and-the-moon-40608428753200.webp?v=1775972014","url":"https:\/\/www.retailmaharaj.com\/products\/trika-bhava-and-the-moon-1","provider":"Retail Maharaj","version":"1.0","type":"link"}