{"product_id":"brahmbhoj-kahani-sangrah-paperback-sachidanand-singh-paperback-sachidanand-singh","title":"Brahmbhoj (Kahani Sangrah ) [Paperback] Sachidanand Singh [Paperback] Sachidanand Singh","description":"\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor:\u003c\/b\u003e Sachidanand Singh\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eBrand:\u003c\/b\u003e Anuugya Books\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eEdition:\u003c\/b\u003e 1\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eFeatures:\u003c\/b\u003e \u003c\/p\u003e\u003cul\u003e\u003cli\u003eShort Stories, Brahmbhoj\u003c\/li\u003e\u003c\/ul\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eBinding:\u003c\/b\u003e paperback\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages:\u003c\/b\u003e 166\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eRelease Date:\u003c\/b\u003e 01-12-2018\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eDetails:\u003c\/b\u003e अचानक अवधेश की गर्दन एक बलिष्ठ कोहनी की गिरफ्त में आ गयी, जिसकी लम्बी-चौड़ी हथेली उसके मुँह से चिपक गयी थी। उसने कुछ बोलने की कोशिश की पर ऐसा लगा कि पैर की हड्डी पर किसी ने लकड़ी का एक हथौड़ा पटक दिया। अवधेश दर्द से बिलबिला गया। बायीं तरफ बैठे लड़के ने हथौड़ा दिखाते कहा 'यह कुछ भी नहीं था, फिर मुँह खोले तो फ्रैक्चर पक्का समझोÓ अब तक उसकी आँखों और उसके मुँह को एक गमछे से अच्छी तरह लपेटा जा चुका था। बोलना तो दूर, साँस लेना भी दूभर हो चला था। अवधेश को कुछ सोचने-समझने की फुर्सत नहीं थी। वह जोर-जोर से अपने पैर चलाने लगा कि अचानक हथौड़े की एक जोरदार चोट उसकी जाँघ पर पड़ी और वह सिसकने लगा। समझ गया कि फिरौती के लिए उसे उठाया गया है, ये अभी जान से तो नहीं मारेंगे, पर अब छूटने का भी कोई उपाय नहीं है। उसने अपने को ढीला छोड़ दिया। पता नहीं मकान मालिक ने इस कार को देखा था या नहीं। नम्बर तो किसी ने नहीं ही नोट किया होगा, पर कोई अगर गन्दे सफेद रंग का एम्बेसडर ही बता पाता तो कुछ तो काम आता शिनाख्त करने वालों को। पता नहीं प्रह्लाद को तेल मिलेगा या नहीं, दुकान से लाकर उसने चौके की जगह, अपनी पैण्ट टाँगते समय तेल की शीशी को अलमारी में ही रख दिया था। यहाँ जान जा रही है और मैं प्रह्लाद को तेल नहीं मिलने की चिन्ता कर रहा हूँ। बाबू जी को पता चलेगा तो वे तुरन्त घोरघट के महतो जी के पास जायेंगे। महतो जी के बहुत लाग-भाग हैं–भागलपुर और मुंगेर, दोनों के एस. पी. के साथ उनकी जान-पहचान है। उसे थोड़ी भूख भी लगने लगी थी। खाना बनाकर वह प्रह्लाद का इन्तजार कर रहा था। प्रह्लाद अब तक आ गया होगा, पता नहीं खा रहा होगा कि मेरा इन्तजार कर रहा होगा।\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003ePackage Dimensions:\u003c\/b\u003e 9.0 x 6.0 x 0.5 inches\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguages:\u003c\/b\u003e Hindi\u003c\/p\u003e","brand":"Anuugya Books","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":66901233172784,"sku":"DRG.AnuugyaBooks_B07DCQTD9C","price":150.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0690\/9968\/4144\/files\/813Mx0SXNOL.jpg?v=1780572762","url":"https:\/\/www.retailmaharaj.com\/products\/brahmbhoj-kahani-sangrah-paperback-sachidanand-singh-paperback-sachidanand-singh","provider":"Retail Maharaj","version":"1.0","type":"link"}