Vishwa Vedna ke Udgata : Janardan Prasad Jha ‘Dvij’ -- विश्व वेदना के उद्गाता जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’
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Author: लक्ष्मीनारायण ‘सुधांशु’, सुरेन्द्र प्रसाद जमुआर, देवेन्द्र कुमार ‘देवेश’
Brand: Anuugya Books
Edition: Ist
Binding: hardcover_comic
Number Of Pages: 188
Release Date: 01-12-2022
Details: ‘द्विज’ जी की ‘अनुभूति’ और श्री लक्ष्मीनारायण मिश्र का ‘अन्तर्जगत्’ छायावादी युग की बड़ी देन है। जिस समय छायावाद को लेकर हिन्दी में घनघोर आन्दोलन छिड़ा हुआ था, उस समय नये स्कूल को स्थापित करने के लिए जितने भी लेख प्रकाशित किये जाते थे, उनमें ‘अनुभूति’ की कविताओं का उद्धरण अनिवार्य रूप से रहता था। वैयक्तिकता छायावाद की सबसे बड़ी स्वभावगत विशेषता थी और उसका रसमय परिपाक द्विज जी की कविताओं में बहुत आरम्भ में ही हो चुका था। नयी चेतनाओं को सबसे पहले हृदयंगम कर लेनेवालों में ‘अनुभूति’ के कवि का प्रमुख स्थान था। पन्त जी की ‘मौन निमन्त्रण’ और द्विज जी की ‘अयि अमर शान्ति की जननि जलन’ कविताएँ हिन्दी में कितनी बार और कितने प्रसंगों पर उद्धृत हुईं, यह गिनती के बाहर है। ‘अन्तर्जगत्’ और ‘अनुभूति’ की कविताओं के पढ़ने से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि प्रेम का घाव संसार में सबसे सुन्दर और सबसे भयानक चीज़ है। इस घाव से मनुष्य का हृदय ही नहीं, उसकी आत्मा भी फट जाती है और ज्यों-ज्यों इसका विस्तार बढ़ता है, त्यों-त्यों मनुष्य भी गहरा और विस्तीर्ण होता जाता है। – रामधारी सिंह ‘दिनकर’ श्रद्धेय ‘द्विज’ जी ..... अँग्रेजी, बांग्ला, मैथिली और हिन्दी के पंडित तो थे ही, जहाँ तक मैंने सुना है, वह संस्कृत के भी अच्छे विद्वान थे। उनकी कहानियों ने अपने समय में ख़ूब प्रतिष्ठा पायी थी। मुझे याद आता है कि हिन्दी के प्रथम कहानी संकलन 'मधुकरी' के लिए स्वर्गीय पंडित विनोद शंकर जी व्यास ने उनकी भी एक कहानी चुनी थी। किसलय, मृदुल, मालिका, मधुमयी, अनुभूति और अन्तर्ध्वनि आदि उनकी रचनाओं ने अपने समय में यथेष्ट कीर्ति प्राप्त की थी। ‘द्विज’ जी शायद पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने प्रेमचन्द की कहानी और उपन्यास-कला पर शोध-प्रबन्ध लिखा था। .... – अमृतलाल नागर
Package Dimensions: 9.5 x 6.5 x 0.7 inches
Languages: Hindi





