{"product_id":"sampoorna-kahaniyan-mannu-bhandari-सम्पूर्ण-कहानियाँ-मन्नू-भंडारी","title":"Sampoorna Kahaniyan : Mannu Bhandari | सम्पूर्ण कहानियाँ : मन्नू भंडारी","description":"\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor:\u003c\/b\u003e Mannu Bhandari\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eBrand:\u003c\/b\u003e Rajkamal Prakashan\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eBinding:\u003c\/b\u003e paperback\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages:\u003c\/b\u003e 498\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eRelease Date:\u003c\/b\u003e 15-07-2008\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eDetails:\u003c\/b\u003e कई बार ख़याल आता है कि यदि मेरी पहली कहानी बिना छपे ही लौट आती तो क्या लिखने का यह सिलसिला जारी रहता या वहीं समाप्त हो जाता...क्योंकि पीछे मुड़कर देखती हूँ तो याद नहीं आता कि उस समय लिखने को लेकर बहुत जोश, बेचैनी या बेताबी जैसा कुछ था। जोश का सिलसिला तो शुरू हुआ था कहानी के छपने, भैरव जी के प्रोत्साहन और पाठकों की प्रतिक्रिया से।\u003cbr\u003e\n\u003cbr\u003e\nअपने भीतरी ‘मैं’ के अनेक-अनेक बाहरी ‘मैं’ के साथ जुड़ते चले जाने की चाहना में मुझे कुछ हद तक इस प्रश्न का उत्तर भी मिला कि मैं क्यों लिखती हूँ? जब से लिखना आरम्भ किया, तब से न जाने कितनी बार इस प्रश्न का सामना हुआ, पर कभी भी कोई सन्तोषजनक उत्तर मैं अपने को नहीं दे पाई तो दूसरों को क्या देती? इस सारी प्रक्रिया ने मुझे उत्तर के जिस सिरे पर ला खड़ा किया, वही एकमात्र या अन्तिम है, ऐसा दावा तो मैं आज भी नहीं कर सकती, लेकिन यह भी एक महत्त्वपूर्ण पहलू तो है ही। किसी भी रचना के छपते ही इस इच्छा का जगना कि अधिक से अधिक लोग इसे पढ़ें, केवल पढ़ें ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ें भी—संवेदना के स्तर पर उसके भागीदार भी बनें यानी कि एक की कथा-व्यथा अनेक की बन सके, बने...केवल मेरे ही क्यों, अधिकांश लेखकों के लिखने के मूल में एक और अनेक के बीच सेतु बनने की यह कामना ही निहित नहीं रहती?\u003cbr\u003e\n\u003cbr\u003e\nमैंने चाहे कहानियाँ लिखी हों या उपन्यास या नाटक—भाषा के मामले में शुरू से ही मेरा नज़रिया एक जैसा रहा है। शुरू से ही मैं पारदर्शिता को कथा-भाषा की अनिवार्यता मानती आई हूँ। भाषा ऐसी हो कि पाठक को सीधे कथा के साथ जोड़ दे...बीच में अवरोध या व्यवधान बनकर न खड़ी हो। कुछ लोगों की धारणा है कि ऐसी सहज-सरल, बकौल उनके सपाट भाषा, गहन संवेदना, गूढ़ अर्थ और भावना के महीन से महीन रेशों को उजागर करने में अक्षम होती है। पर क्या जैनेन्द्र जी की भाषा-शैली इस धारणा को ध्वस्त नहीं कर देती? हाँ, इतना ज़रूर कहूँगी कि सरल भाषा लिखना ही सबसे कठिन काम होता है। इस कठिन काम को मैं पूरी तरह साध पाई, ऐसा दावा करने का दुस्साहस तो मैं कर ही नहीं सकती, पर इतना ज़रूर कहूँगी कि प्रयत्न मेरा हमेशा इसी दिशा में रहा है।\u003cbr\u003e\n—भूमिका से\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eEAN:\u003c\/b\u003e 9788119092185\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003ePackage Dimensions:\u003c\/b\u003e 8.6 x 5.6 x 1.3 inches\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguages:\u003c\/b\u003e Hindi\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":66908201910576,"sku":"DRG.UnboundDistribution_9788119092185","price":488.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0690\/9968\/4144\/files\/61_A8KfY-nL.jpg?v=1780769899","url":"https:\/\/www.retailmaharaj.com\/bn\/products\/sampoorna-kahaniyan-mannu-bhandari-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a8%e0%a5%82-%e0%a4%ad%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80","provider":"Retail Maharaj","version":"1.0","type":"link"}