{"product_id":"parchhain-kee-khidki-se","title":"Parchhain Kee Khidki Se","description":"\u003cp\u003e\u003cb\u003eAuthor:\u003c\/b\u003e Rajula Shah\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eBrand:\u003c\/b\u003e Vani Prakashan\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eEdition:\u003c\/b\u003e 3rd\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eBinding:\u003c\/b\u003e hardcover\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eNumber Of Pages:\u003c\/b\u003e 104\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eRelease Date:\u003c\/b\u003e 09-04-2024\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eEAN:\u003c\/b\u003e 9789357756235\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003ePackage Dimensions:\u003c\/b\u003e 8.3 x 5.9 x 0.8 inches\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eLanguages:\u003c\/b\u003e Hindi\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cb\u003eDetails:\u003c\/b\u003e परछाईं की खिड़की से - युवा कवयित्री राजुला शाह का यह पहला कविता-संग्रह है। उनकी कविता स्पर्श और दृष्टि की हल्की-सी छुअन के साथ वस्तु-जगत के रूपान्तरों से खेलती हुई सहज ही अमूर्त के अथाह में छलांग लगाती देखी जा सकती है। एकदम निजी और अन्तरंग को व्यक्त करने के, लिए राजुला जिन बिम्बों और उपमाओं को लाती हैं वे उसे न केवल गहराई देते हैं, एक ताजगी भी दे जाते हैं- 'कहा जो हवा में कोई फूँक-सा उसे सुन ले झरने की झिलमिल छाया में पानी पर ततैया के खेल-सा मन में छूट जाए।' प्रकृति और जीवन के इन सघन राग-संवेगों के बीच राजुला की कविताओं में मृत्यु और अस्मिता के सवाल सहज कौंध की तरह आते हैं- 'अभी हैं अभी नहीं हैं होना न होना कितना सहज था आँखें बन्द करके छुप सकते थे बचपन में ।' आज जब कविता बोलचाल के नाम पर अपनी व्यंजनात्मक क्षमता खोकर सपाट हुई जा रही है, राजुला का शब्द और लय के नये, अर्थपूर्ण संयोजन का यह आकर्षण निश्चय ही कविता के पक्ष में महत्त्वपूर्ण संकेत है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eपरछाईं की खिड़की से -\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eयुवा कवयित्री राजुला शाह का यह पहला कविता-संग्रह है। उनकी कविता स्पर्श और दृष्टि की हल्की-सी छुअन के साथ वस्तु-जगत के रूपान्तरों से खेलती हुई सहज ही अमूर्त के अथाह में छलांग लगाती देखी जा सकती है। एकदम निजी और अन्तरंग को व्यक्त करने के, लिए राजुला जिन बिम्बों और उपमाओं को लाती हैं वे उसे न केवल गहराई देते हैं, एक ताजगी भी दे जाते हैं-\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e'कहा \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eजो \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eहवा में \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eकोई फूँक-सा\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eउसे सुन ले \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eझरने की झिलमिल छाया में \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eपानी पर ततैया के खेल-सा \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eमन में छूट जाए।'\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eप्रकृति और जीवन के इन सघन राग-संवेगों के बीच राजुला की कविताओं में मृत्यु और अस्मिता के सवाल सहज कौंध की तरह आते हैं-\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e'अभी हैं \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eअभी नहीं हैं \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eहोना \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eन होना कितना सहज था \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eआँखें बन्द करके \u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eछुप सकते थे बचपन में ।'\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eआज जब कविता बोलचाल के नाम पर अपनी व्यंजनात्मक क्षमता खोकर सपाट हुई जा रही है, राजुला का शब्द और लय के नये, अर्थपूर्ण संयोजन का यह आकर्षण निश्चय ही कविता के पक्ष में महत्त्वपूर्ण संकेत है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e \u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":50068681949488,"sku":"DRG.VaniPrakashan_9789357756235","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0690\/9968\/4144\/files\/81aj_m4DMJL.jpg?v=1756301552","url":"https:\/\/www.retailmaharaj.com\/bn\/products\/parchhain-kee-khidki-se","provider":"Retail Maharaj","version":"1.0","type":"link"}